pangti.in | शब्दों का बाजार!

उत्तर फिज़ाओं में है!

जाने माने गायक बॉब डिलन ने 1962 में ‘ब्लोइंन इन द विन्ड’ लिखा और 1963 में गीत रिलीज हुआ। आज, पाँच दशक बाद भी यह गाना लोगों की जुबां पर है। चाह है की इसे हिन्दी में भी गाया और सुना जाए। इसी लिए यह हिन्दी अनुवाद।

सुदूर हिमालय का यह उत्पात

किन्नौर की वह खूबसूरत घाटी कभी कभार धमाकों की आवाज़ से गूँज उठती थी। कुछ रोज ये धमाके देर रात भी सुनाई दिए। कारण बेहद व्यथित करने वाला था। पर क्या किया जा सकता है? मानव कल्याण की कीमत तो चुकानी ही होगी!

आज तो प्रिये कोई बहाना ना बनाओ!

सावन की वर्षा और यथार्थ की बारिश कितनी अलग हैं। कविताओं, कहानियों व गीतों का सावन सपने जगाता है। यथार्थ का सावन मुँह चिढ़ाता है। उसी चिढ़ावन पर कुछ पंक्तियाँ।

अछूत पंडित

दिन भर, बेखौफ, यहाँ वहाँ की खाक छान कर पंडितजी शाम को जबरदस्त पूजा अर्चना करते थे। बावजूद उसके पण्डितजी को कोविड हो गया। बात बिगड़ी, पर उतनी नहीं की अस्पताल जाना पड़े।

बोलना जरुरी है

बचपन से ही लोगों को कहते हुआ सुना है – मितभाषी बनो! कम बोलो, अच्छा बोलो! कई मायनों में यह बात सही है। पर कई मायनो में गलत भी। कम बोलना अच्छी बात है। पर केवल तब तक, जब तक मन मस्तिष्क सुन्न नहीं हैं।

वर्तमान ये भूल ना जाना

लोकतंत्र लोक से चलता है। पर लोक कैसे चलता है? प्रचार से? अधिप्रचार से? या समझ बूझ से – यथार्थ की निष्पक्ष समीक्षा करते हुए उज्वल और ईमानदार भविष्य के व्यावहारिक सपने बुनता हुआ!

बच्चों के बाबत

खलील गिबरान की एक मशहूर कविता है ‘ऑन चिल्ड्रन’। यह कविता दीप्ति व मेरी तब भी प्रिय थी जब हम माता पिता नहीं बने थे, और आज भी है। जब भी मन संशय में होता है तो हम इसे पढ़ लेते हैं। कविता का यह हिन्दी अनुवाद इसलिए ताकि आवाज़ दूर तक जा सके।

महामारी में इश्क

जब चारों दिशाओं में हाहाकार मचा हो, हर तरफ से दुख की ही खबरें आ रहीं हो तब व्याकुल मन उस अंधकार में रोशनी तलाशने निकलता है। क्योंकि रोशनी के बिना अंधकार संभव ही नहीं। एक ऐसी ही रोशनी की लघु कथा।

ओ बसन्त लौट के आओ

मेरी डायरी में बंद कविताएँ मैंने एक दो लोगों को छोड़ कभी किसी के साथ साझा नहीं की। कोशिश है की उनमें से कुछ, संदर्भ के साथ, यहाँ प्रकाशित करूँ। इसलिए pangti.in की शुरुआत अपनी लिखी पहली कविता से कर रहा हूँ।