कुछ अपने बारे में

कुछ अपने बारे में

पाँगती.इन (pangti.in) हमारे लिए अपनी बात रखने का माध्यम ही नहीं वरन चिंतन करने और अपनी सोच को निखारने का एक मौका भी है। हम अर्थात मैं, नवीन पाँगती, व मेरी मित्र व पत्नी दीप्ति बिष्ट पाँगती।

यूँ तो दीप्ति को लिखने का शौक नहीं है पर मैं अपना लिखा अक्सर सबसे पहले उसे ही पढ़ाता हूँ। जब किसी बात से मूड खराब होता है या गुस्सा आता है तो दीप्ति कहती है ‘उल्टी कर ले’। यहाँ उल्टी का तात्पर्य शब्दों की उल्टी से है, यानि की कविता और कहानियाँ। जहाँ एक ओर बहस करने से गुस्सा या दुख बढ़ जाता है, वहीं लेखन से विचारों को समेटने में मदद मिलती है, मन चित्त शांत होने लगता है।

दीप्ति मूलतः पौढ़ी गढ़वाल (उत्तराखंड) की रहने वाली है। देहरादून में स्कूल व कॉलेज करने के पश्चात् दीप्ति ने पाँच वर्ष तक भारतीय सेना में नर्सिंग ऑफिसर के रूप में कार्य किया। दादी नानी के नुस्खे, खानपान की परम्परा, आयुर्वेद, वैकल्पिक चिकित्सा, पोषण, पारम्परिक खेती, आदि में उसकी गहरी रूचि है। उसे पढ़ने का भी बहुत शौक है और प्रेमचंद की कहानियाँ उसे सबसे अधिक प्रिय है। हिमालय के एक गाँव में अपनी नानी के साथ बिताई छुट्टियाँ उसे आज भी भाव विभोर कर देती हैं। पहाड़ी संस्कृति और पहाड़ का जीवन उसे आनन्द देता है यद्यपि यहाँ के जाड़े से उसे कोई खास प्रेम नहीं है।

मैं मूलतः जोहर घाटी, तहसील मुनस्यारी, जिला पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) का रहने वाला हूँ। जोहार की घाटियों से दूर पिथौरागढ़, हल्द्वानी व नैनीताल में स्कूली शिक्षा ग्रहण कर मैं मैकेनिकल इंजिनियर बनने ईलाहबाद के मोतीलाल नेहरु इंजीनियरिंग कॉलेज (अब एम.एन.एन.आई.टी) चला गया। तमगा मिल गया पर ज्ञान और रुझान के अभाव में मैं विज्ञापन लिखने की ओर प्रेरित हुआ। वहाँ पता चला की रुझान तो कहीं और ही है अतः मैं डिजाईन की उच्चतर शिक्षा के लिए आई.आई.टी. मुंबई के इंडस्ट्रीयल डिजाईन सेंटर (आई डी सी) चला गया। फिर 17 सालों तक दिल्ली व गुडगाँव की खाक छानी। पहले नौकरी की, फिर मित्रों के साथ अपनी कंपनी चलाई और अन्ततः घर से ही एक मुक्त डिजाईनर के रूप में काम करने लगा।

पर ये मुक्ति भी हम दोनों के मन को नहीं भाई। भीड़ तंग करने लगी। शहर की तेज़ी से सिर चकराने लगा। राजनैतिक, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था को देख कर मन खिन्न होने लगा। दिल में उठी टीस ने आखिरकार हमें अपना बोरिया बिस्तर उठा कर शहर से भाग जाने को विवश कर दिया।

अब हम उत्तराखण्ड राज्य में अल्मोड़ा के पास एक गाँव में रहते हैं और खेती कर रहे हैं। मैंने काष्ठकला की एक छोटी सी कार्यशाला भी बना रखी है। लेखन व डिजाईन की रूचि अब भी अपने यौवन का आनन्द ले रही है। दीप्ति को लेखन से ज्यादा लगाव नहीं है पर अपनी बात रखने, अपने अनुभव बाँटने और अपने सफर की चर्चा करने के लिए वो तैयार रहती है। हमारे इस सफ़र में हमारे साथ हमारी दो प्यारी बेटियाँ भी हैं जो होमस्कूलिंग के जरिए अपने रास्ते तराश रहीं हैं।

सफर जारी है। और मुझे इस बात की खुशी है की मैं इस सफर को शब्द दे पा रहा हूँ और इन शब्दों को आपका साथ है!