कब जागोगे पथिक?

प्रकृति बार बार आगाह करती है। हम बार बार उसे समझने की कोशिश सा करते हैं। बार बार सवाल उठाते हैं और जवाब ढूँढते हैं। फिर बार बार कुछ ठोस कदम उठाने की प्रतिज्ञा लेते हैं। पर अंततः भूल जाते हैं!

जाने कब तक करते रहेंगे हम जाग जाने या जगे रहने का यह ढकोसला? डर लगता है की कहीं इतनी देर ना हो जाए की कुछ कहने सुनने को बचा ही ना हो।

कब जागोगे पथिक?

हिमनदियाँ पिघल
बादल बन बरसें,
इतनी सिली धरा
की सूखे को तरसे,
नदियों हो रहीं हैं
आपे से बाहर,
ध्यान मग्न भूमि
जग आज सरके।

क्या लुटी पृथ्वी का
कोई प्रतिकार है ये?
क्या विक्षिप्त धरा का
कोई विकार है ये?
ये भूस्खलन, ये बाढ़,
ये मेघ विस्फोट,
क्या लापरवाह उपभोग
का कोई आकार है ये?

जाने क्यों लगती है यह
एक निश्चित सी अगवाई,
जाने क्यों वेदी यह अब भी
हमें देती नहीं दिखाई।
सराय स्वार्थ की निद्रा से
कब जागेंगे पथिक?
क्यों अब भी चीखें
हमें देती नहीं सुनाई?

Leave a Reply

Your email address will not be published.