फ्यूंली

कहते हैं की हर दस किलोमीटर में भाषा का स्वरुप बदल जाता है। मुहावरे और लोकोक्तियाँ बदलने लगती हैं। कुछ ऐसा ही लोक कथाओं के साथ भी होता है जो जगह और समय के अनुसार अपने को नए रंग में ढाल लेतीं हैं। ऐसी ही एक अद्भुत कथा है फ्यूंली की।

फ्यूंली उत्तराखंड की एक प्रचलित लोक कथा है। अन्य लोक कथाओं के अनुरूप इस कथा के भी कई रूप हैं पर जिस रूप का मैं पुनःकथन कर रहा हूँ वह श्री प्रभात उप्रेती जी की पुस्तक ‘उत्तराखंड की लोक एवं पर्यावरण गाथाएँ’ में संकलित गाथा ‘फ्यूंली’ पर आधारित है। उनकी कथा का आधार उत्तराखंड के चमोली जिले में प्रचलित लोक कथा है।

तो पेश हैं, उत्तराखंड की एक भावपूर्ण व मार्मिक लोक कथा – फ्यूंली!

उत्तराखंड के चमोली जिले में तुंगनाथजी का एक मशहूर मंदिर है जिसके कारण इस स्थान को तुंगनाथ के नाम से जाना जाता है। पहाड़ों की विस्मयकारी ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर सदियों पुराना है। जितना अदभुत यह मंदिर है उतना ही अदभुत है इससे सटा बुग्याल जिसे तुंगनाथ बुग्याल के नाम से जाना जाता है। बुग्याल अर्थार्त मीडोज़, यानी दूर दूर तक फैली हरी घास का पहाड़ी चारागाह जिसमें खिलते हैं अनगिनत फूल और उनको चूमते अनगिनत भोंरे और तितलियाँ। इस बुग्याल में कई तरह की चिड़ियों का भी वास है, जिनमें खास थी मोनाल – एक रंगबिरंगी पक्षी जो देखने में तीतर सी है पर रंग उसने मोर के पाए हैं। सिर पर मोर की कलगी सी कलगी भी होती है उसके, पर मोर के समान लम्बे पंख नहीं होते जिन्हें फैला कर वो उन्मुक्तता से इन सुंदर वादियों में नाच सके। मोनाल के अलावा इस बुग्याल में हिरण प्रजाति के काकड़ और घुरड़ तथा हिमालयी भालू जैसे जानवर भी विचरण करते हैं। वो सदियों से यहाँ रहते आए हैं। तब से जब फ्यूंली यहाँ की राजकुमारी थी।

फ्यूंली को राजकुमारी कहना ठीक नहीं रहेगा क्योंकि वो हर मायने में यहाँ की रानी थी। उम्र में छोटी जरुर थी, बहुत प्यारी थी, बच्ची थी पर राज यहाँ उसी का चलता था। पूर्णिमा के चाँद सी मनभावक, एक सुनहरी शाम के गुलाबी बादलों से उसके गाल, फूलों की पंखुड़ियों सी उसकी कोमल त्वचा, हिमशिखरों सा उज्जवल मन, मंद मंद चलती ठण्डी पहाड़ी हवा सा उसका स्पर्श और कल-कल करती पहाड़ी जल धारा सी उसकी आवाज़। वो प्रकृति की बेटी थी, प्रकृति की गोद में पली थी और प्रकृति ही उसका घर था। बुग्याल से सभी पेड़ पौंधे, सभी फल फूल, कभी भोरें, सभी तितलियाँ, सभी पक्षियाँ और सभी जानवर उसे अपनी रानी मानते थे, उसकी बात का आदर करते थे, उसपर जान छिडकते थे और उसके बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे।

तितलियाँ फ्यूंली के लिए रंग बिरंगे वस्त्र लातीं तो मधुमक्खियाँ शहद। फूल उसे इत्र देते तो घास उसका कोमल बिछोना बनते। पक्षी उसके लिए दूर देश से कंद मूल लाते। फिर वे सब मिल जुल कर नाचते, गाते, हँसते और आनन्दित होते। फ्यूंली उनके साथ एक लय में गाती और नाचती। प्रकृति के इस दरबार में समय अक्सर रुक जाया करता था। सूरज भी आगे बढ़ना भूल अपनी गुनगुनी धूप से प्रकृति को यूँ लुभाने लगता मानो वह केवल इनके लिए ही चमकता हो। कभी कभी तो स्वर्ग से परियाँ भी यहाँ उतर कर इस अदभुत पर्व, इस अविस्वस्नीय जश्न का हिस्सा बन जातीं। इससे अधिक आनन्द, इससे अधिक सौंदर्य और क्या हो सकता था? इसके अलावा स्वर्ग और कहाँ हो सकता था?

जितना प्रेम सब फ्यूंली से करते थे फ्यूंली भी उतना ही प्रेम सबसे करती। उसके लिए यह बुग्याल और यहाँ के वासी प्रजा नहीं अपितु परिवार थे। उस नन्ही रानी को हर किसी की फिक्र रहती थी। वह सबकी समस्याओं का समाधान भी करती। कहाँ घास कम है? कहाँ फूल कम हैं? कहाँ फल कम हैं? कोई फूल अगर नहीं खिला तो क्यों नहीं खिला? कहाँ बर्फ पिघली और कहाँ नहीं? जाड़ों में जो जानवर व पशु पक्षी गरम इलाकों को चले गए थे वो क्या वापस आए या नहीं? जो जाड़ों में यहीं रहे क्या वो ठण्ड से बचे रहे? उनको कोई अन्य कष्ट तो नहीं है? फ्यूंली के यहाँ रहते सभी के कष्टों का समुचित निवारण होता रहता। और अगर निवारण ना भी हो पाए तो फ्यूंली उन्हें कष्ट से जूझने की ताकत देती और ढाँढ़स बँधाती।

प्रजा अपनी शिकायतें भी ले कर आती फ्यूंली के पास। जैसे मधुमक्खियाँ शिकायत करती उन भालुओं की जो उनका शहद चुरा ले गए। पक्षी बताते की कौन सा अन्य पक्षी या जानवर उनके घोंसलों पर बुरी निगाह डाले बैठा है। घास बताते की कौन से जानवर उन्हें जरुरत से ज्यादा खा रहे हैं। फ्यूंली ध्यान से सबकी बातें सुनती। हल निकालती। वह फिर सबको कहानियाँ भी सुनाती। लम्बी लम्बी कहानियाँ जो तब तक नहीं रूकती रहती जब तक सभी फूल पौंधे, पक्षी, जानवर और वह खुद स्वप्न लोक में नहीं खो जाते।

और फिर एक नया सवेरा। नई खुशियाँ। नई बातें। जीवन की घड़ी अपनी अविरल गति से चलती रहती। घोसलों में पल रहे चिड़ियों के बच्चे उड़ना सीख आसमान को छूने की कोशिश करने लगते। नए जोड़े बनते। फिर नए घोंसले। फ्यूंली भी समय की इस घड़ी से अछूती नहीं रही। धीरे धीरे वो जवान हो गई। उसके नव सौंदर्य से बसन्त भी अपना मुँह छिपाने लगा। ऐसा अदभुत सौंदर्य की देखने वाला भी कुछ पलों के लिए इस आभास से व्यथित हो जाता की कहीं उसके देखने मात्र से फ्यूंली का सौंदर्य धुमिल ना हो जाए। उसके सौंदर्य में देवता व मनुष्य की सभी अच्छाइयों का वास था। प्रकृति स्वयं उसके सौंदर्य को देख आनन्दित थी, पर थोड़ा चिन्तित भी। प्रकृति की चिन्ता अकारण नहीं थी।

एक दिन जब फ्यूंली बुग्याल में स्थित एक छोटे से तालाब के किनारे बैठी पानी के दर्पण में खुद तो निहार रही थी कि तभी एक विचित्र जीव उसे अपनी ओर आता दिखा। एक ऐसा जीव जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था। जिसके होने का उसे आभास तक नहीं था। वो जीव था तो कुछ कुछ उसी की तरह पर उस सा नाजुक व सुन्दर नहीं था। उसका शरीर बड़ा और बलिष्ठ था। उसके होंठो के ऊपर बाल थे। उसके गाल की त्वचा खुरदरी थी। उसकी भुजाएँ देवदार के पेड़ के तने सी थीं। उसी छाती चट्टान सी दिखती थी। उसकी आवाज़ में बादलों की गर्जन थी। और उसके बड़े सिर पर फूलों का एक ताज विराजमान था। वह उस सा भी था और उसका विपरीत भी। ना जाने क्यों फ्यूंली को उसकी यह विपरीतता भा रही थी। उसे देख फ्यूंली कुछ पलों के लिए खड़ी की खड़ी रह गयी। फ्यूंली को यूँ हतप्रभ देख उस जीव ने उसे इशारों इशारों में समझाया की वो उसी की प्रजाति का पुरुष है। उसने समझाया की उसका विपरीत होना उसकी कुरूपता नहीं अपितु सौंदर्य है इसीलिए तो फ्यूंली को उसे देख कर अच्छा लगा।

अपने होश सँभालते हुए फ्यूंली ने उसे इशारों इशारों से बताया कि किसी भी अन्य जीव का इस बुग्याल में आना मना है।  पर अब जब वह आ ही चुका है तो उसका स्वागत है। फ्यूंली ने उसे बताया कि वो यहाँ कि रानी है और फिर उसे अपनी प्रजा से मिलाया। प्रजा ने भी इस मेहमान को अपने सिर आँखों पर बिठा लिया। वे तरह तरह के उपहार लाए इस मेहमान के लिए। दूर दूर से उसके लिए कंद मूल लाए गए। फ्यूंली और उसकी प्रजा के इस अपार प्यार-दुलार के कारण मेहमान कई दिनों तक बुग्याल छोड़ कर न जा सका।

कुछ ही दिनों में वह और फ्यूंली एक दूसरे की थोड़ी बहुत बातें समझने लगे। जब भाषा से बात नहीं बनती तो वे इशारों में अपनी बातें पूरी कर लेते। एक दूसरे के इशारे वे खूब समझने लगे थे। उसने फ्यूंली को बताया की वो भी एक राजकुमार है। उसका भी एक राज्य है। फ्यूंली ने सोचा कि इसी बुग्याल कि तरह कोई अन्य बुग्याल होगा जहाँ का यह राजकुमार है। फिर एक दिन राजकुमार ने फ्यूंली के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया। पर बेचारी फ्यूंली को क्या पता की विवाह क्या होता है अतः वो भी राजकुमार को ही उसे समझाना पड़ा।

राजकुमार ने फ्यूंली को यह भी बताया की विवाह के बाद उन दोनों को सदा के लिए साथ रहना होगा। फ्यूंली को यह बुग्याल छोडना होगा। फ्यूंली गहरी सोच में पड़ गई। तुंगनाथ बुग्याल छोडना होगा? यह कैसे सम्भव है? यह बुग्याल ही तो उसका जीवन है। उसके बिना यहाँ उसकी प्रजा का ख्याल कौन रखेगा? विवाह की सम्भावना उसे अच्छी लगी पर विवाह के कारण उसे यहाँ से जाना पड़ेगा यह बात उसे कतई मंजूर नहीं थी। जब प्रजा को यह बात पता लगी तो उनको भी राजकुमार का यह प्रस्ताव बिलकुल पसंद नहीं आया। उन्होंने साफ़ साफ़ कह दिया की वे फ्यूंली को तुंगनाथ बुग्याल छोड़ कर जाने नहीं देंगे।

जब मामला अत्यन्त पेचीदा हो गया तो प्रकृति ने तय किया की अब उसे ही बीच बचाव करना होगा। फ्यूंली के चले जाने की सम्भावना से उसकी आँखों में भी आसूँ आ गए थे पर अपने आँसुओं की धारा को रोक कर उसने सबको समझाया की फ्यूंली का विवाह करना और राजकुमार के साथ चले जाना उसकी नियति है। और यह फ्यूंली के लिए अच्छा भी है। फ्यूंली का सौभाग्य है की उसे एक प्रेम करने वाला साथी मिला है क्योंकि यहाँ बुग्याल में कोई पुरुष नहीं है। अन्य सभी जीव जन्तु विवाह करते हैं, उनके परिवार होते हैं तो फ्यूंली का क्यों नहीं? राजकुमार के प्रति फ्यूंली के आकर्षण को प्रकृति की इन बातों से बल मिला और वह बुग्याल और अपनी प्रजा को छोड़ राजकुमार के साथ जाने के लिए तैयार हो गई।

तय हुआ कि अगले ही दिन वह राजकुमार के साथ उसके राज्य की ओर निकल पड़ेगी। यह सुनते ही सभी रोने बिलखने लगे। अगले दिन सभी पशु पक्षी रोते बिलखते हुए फ्यूंली को छोड़ने बहुत दूर तक निकल आए। वे तब तक चलते रहे जब तक प्रकृति ने उन्हें रुकने के लिए नहीं कहा। प्रकृति ने उन्हें आगाह किया की उनकी सीमायें समाप्त हो चुकी हैं। यहाँ से और आगे जाना उनके हित में नहीं है। उनकी जान को खतरा हो सकता है।

आखिरकार मन मार कर, अश्रुपूर्ण आँखों से अपनी प्यारी फ्यूंली को विदा कर, सभी पशु पक्षी बुग्याल की ओर वापस आने लगे। वापस आते हुए वे बार बार इस आशा से मुड़ कर पीछे देखते की शायद फ्यूंली ने मन बदल लिया हो। उन्हें अब भी विश्वास था की फ्यूंली उन्हें छोड़ कर नहीं जायेगी।

फ्यूंली भी बहुत उदास थी। जैसे तैसे रोते बिलखते वह अपने ससुराल पहुँची। वहाँ उसका भव्य स्वागत हुआ। नगर के द्वार से महल के द्वार तक रास्ते भर में फूलों की कालीन बिछी थी। प्रजा राजकुमार और फ्यूंली की जय जयकार कर रही थी। इतना बड़ा नगर और इतना विशाल महल देख कर वो भौचक्की रह गई। महल से भीतर पहुँच कर राजकुमार ने उसे ऐशो आराम के सभी साधन दिखाए। महल में तीन हज़ार कमरे थे। एक हज़ार बिस्तर थे। तरह तरह से साजो समान थे। 5000 नौकर चाकर थे। फ्यूंली को 36 तरह के व्यंजन परोसे गए। फिर पूछा गया की 1500 पेयों में से वह कौन सा पेय पीना पसन्द करेंगी? फ्यूंली ने आश्चर्यचकित निगाहों से राजकुमार की ओर देखा और कहा, “क्या करूँ मैं इस सब का? मुझे तो खाने के लिए एक कौर चाहिए और सोने के लिए एक अदद पलंग। बाकि कुछ नहीं!”

राजकुमार के स्नेह के सहारे वह धीरे धीरे इस नए जीवन को अपनाने लगी। पर उसे अपना बुग्याल, अपनी प्रजा, वहाँ के फल फूल, ठण्डी हवा, स्वच्छ नीला आकाश, जादुई सूर्यास्त, बादलों का घुमड़ना, बर्फ का गिरना, फूलों का खिलना… सब याद आते रहते। अपने पर्वत शिखरों, अपनी घाटियों, अपनी नदियों को वो भूल नहीं पा रही थी। उसे लग रहा था मानो वे उसे बुला रहे हैं। उसकी यादें धीरे धीरे आँसुओं का रुप लेने लगीं। तुंगनाथ की वादियों उसे पुकारने लगी। वो मन ही मन अपने बुग्याल को याद करती और कहती – “यहाँ मेरा मन नहीं लग रहा है रे! मुझे वापस ले जाओ! यहाँ मुझे ठीक से नींद नहीं आती है। यहाँ मुझे ठीक से भूख नहीं लगती है। यहाँ का खाना मुझे ठीक से नहीं पचता है। यहाँ मुझे आनन्द नहीं आता है। यहाँ कोई गीत नहीं गाता है। यहाँ मुझे कुछ भी नहीं भाता है! हे प्रकृति माता! तुने मुझे जाने को क्यों कहा? तुने मुझे आगाह क्यों नहीं किया की मेरी यादें ही मेरी दुश्मन बन जाएँगी। अगर तुझे मेरे इस दुःख का जरा भी आभास था तो तुने मुझे रोका क्यूँ नहीं?”

खुद से शिकायत करते करते फ्यूंली मुरझाने लगी। और फिर वह बीमार पड़ गई। दूर दूर से सैकड़ों वैध हकीम आए पर कोई उसे ठीक न कर सका। जब कुछ इलाज़ नहीं निकला तो राज वैध ने राजकुमार को बताया की फ्यूंली को ‘खुद’ लगी है। गढ़वाली भाषा में ‘खुद’ का अर्थ होता है विरह, वियोग… और इससे से बड़ी कोई बीमारी नहीं होती। इसका कोई इलाज़ नहीं है। फ्यूंली धीरे धीरे कमजोर होती गई। राजकुमार का अथाह प्यार भी उसके किसी काम नहीं आया।

एक सुबह ना जाने क्यों फ्यूंली को लगा की उसके जाने का वक्त आ गया है। उसने अपने सिरहाने के पास बैठे राजकुमार से कहा की अब शायद वह नहीं बचेगी। उसने राजकुमार से आश्वासन लेना चाहा कि वह उसके मरने का दुःख नहीं करेगा और उसकी मृत्यु के लिए कभी भी स्वयं जो दोषी नहीं ठहराएगा। फिर अत्यंत धीमी और कमजोर पड़ती आवाज़ में उसने  राजकुमार से आग्रह किया, “जब मैं अपना शरीर त्याग दूँ तो मेरे शरीर को वापस तुंगनाथ बुग्याल ले जाना और वहीं दफना देना जहाँ हम पहली बार मिले थे। तुम जब वहाँ जाओ तो किसी पशु पक्षी को हानि मत पहुँचाना। किस फूल को मत तोडना और घास को मत रोंदना। कील जड़े जूते नहीं पहनना अपितु भांग के रेशों से बनी मुलायम जूतियाँ पहन कर जाना। वहाँ जोर से मत चिल्लाना। रंग बिरंगे कपड़े पहन कर मत जाना। तुम्हारे ऐसा करने से मेरी प्रजा घबरा जाएगी और वियोग में उसकी व्यथा और भी बढ़ जाएगी।” यह कहते कहते फ्यूंली ने प्राण त्याग दिए। सारे शहर में शोक की लहर छा गई। उधर तुंगनाथ बुग्याल को भी उसी पल तेज आँधी ने घेर लिया। हवाओं की सांय सांय करती आवाज़ किसी अनिष्ट का इशारा करती हुई सभी पेड़ पौधों और पशु पक्षियों को डरा रही थी।

फ्यूंली की इच्छानुसार राजकुमार उसके निर्जीव शरीर को लेकर तुंगनाथ बुग्याल पहुँचा। वह अपने साथ किसी अन्य को नहीं लाया। अपनी निर्जीव पत्नी के साथ बुग्याल तक का सफर उसने अकेले तय किया और खुद ही उसे दफ़नाने लगा। फ्यूंली की सारी प्रजा निर्जीव सी हो गई। इतना घनघोर, इतना विषम था उनका दुःख की आँसुओं ने भी पलकों से निकलने से इन्कार कर दिया। अगर कोई रोया तो वह थी प्रकृति। गर्मी के उस मौसम में भी अचानक बर्फ पड़ने लगी। देखते ही देखे पूरे तुंगनाथ बुग्याल को बर्फ ने ढँक दिया। फ्यूंली की आखिरी नींद में वह बर्फ एक चादर बन कर उससे लिपट गई। समय मानो ठहर गया। हवा का एक झोंका भी चलने को तैयार न था। पूरे बुग्याल में एक अजीब सी मुर्दा शान्ति छा गई। फ्यूंली को दफना कर, बिना कुछ कहे, राजकुमार वहाँ से चुपचाप चला गया।

समय बीतने लगा पर फ्यूंली की प्रजा का दुःख कम होने का नाम नहीं ले रहा था। जाड़ों ने पहाड़ों को घेर लिया। तापमान शुन्य से काफी नीचे जा चुका था पर फ्यूंली की प्रजा अपनी चिन्ता किए बगैर विरह में खोई रही। देखते ही देखते जाड़ा भी बीत गया। बर्फ पिघलने लगी पर दुःख पिघलने का नाम ही नहीं ले रहा था। उधर राजकुमार भी फ्यूंली के वियोग में मरा जा रहा था। जाड़े खत्म होते ही वह वापस तुंगनाथ बुग्याल आ पहुँचा।

राजकुमार जब उस जगह पहुँचा जहाँ उसने फ्यूंली को दफनाया था तो उसकी नज़र एक नन्हे पीले फूल पर पड़ी जिसका पौंधा फ्यूंली की कब्र पर उग आया था। वह पीला फूल उसे बहुत अपना सा लगा। उसे देखते ही स्वतः उसके मुँह से एक हल्की की आवाज़ निकली – फ्यूंली!

आवाज़ हल्की थी पर सबने सुन ली। फ्यूंली नाम सुनते ही बुग्याल के सारे वासियों के कान खड़े हो गए। राजकुमार की वह हल्की सी आवाज़ पूरी घाटी में गूंजने लगी। अपने सारे कामकाज छोड़ बुग्याल के सारे जीव जन्तु दौड़ते हुए आए और उस नन्हे से पीले फूल तो निहारने लगे। रचनाकार प्रकृति तक उस नन्हे पीले फूल को देख आश्चर्यचकित थी। और फिर सबके होंठों से एक साथ धीमी, मधुर पर आश्वस्त आवाज़ निकली – फ्यूंली! सभी आखों में आँसू थे। सभी के गले भरे हुए थे। सब खुश थे। उनकी फ्यूंली जो वापस आ गई थी। उस पल हवा भी ठहर गई और सूरज भी। पूरी एकाग्रता से उस नन्हे फूल को निहारते हुए सभी जन, मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रहे थे।

वह नन्हाँ सा फूल अब तुंगनाथ बुग्याल की सीमाओं को लाँघ कर समस्त उत्तराखंड में खिलता है। वो जाड़े के जाने और बसन्त के आने का आगाज़ करता है। बच्चे फूल संक्रांति अर्थार्थ फूलदेई के त्यौहार पर इसी फूल को गाँव के हर द्वार पर रख जाते हैं। सभी शुभ कार्यों में इस नन्हे फूल का उपयोग होता है।

नव विवाहित बालाओं को यह फूल अपने मायके की याद दिलाता है। उसे देख कर उन्हें भी ‘खुद’ लगती है। अपने माता पिता, अपने गाँव घर और अपनी नदी घाटियाँ उन्हें बहुत याद आते हैं। उनका मायका भी उन्हें बहुत याद करता है और ‘भिटोली’ भेज कर अपने प्यार को व्यक्त करता है। भिटोली में मायके से लड़की के लिए भेंट जाते हैं और भेंट में जाते हैं फ्यूंली के फूल। इस नन्हें से पीले फूल के रूप में, पहाड़ों के इन रीती रिवाजों में, फ्यूंली आज भी जीवित है। अब फ्यूंली कभी मर नहीं सकती!

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