कविताएँ, क्षणिकाएँ व गीत

इस क्षेणी में छोटी बड़ी कविताएँ, गीत, क्षणिकाएँ… सभी हैं। अधिकांश कविताएँ स्वरचित है – जीवन के अलग अलग दौर में। पर कुछ कविताएँ/गीत अनुवादित हैं और कुछ पैरोडी। ऐसी गीत/कविताओं में मूल कविता/गीत का जिक्र या लिंक दिया गया है।

चिरस्थायी समृद्धि का मूल मंत्र

समृद्धि एक ऐसा हाथी है जिसे सब अपने नजरिए से देखते हैं। पर अंततः नजरिया उसका जीतता है जिसके पास अपना नज़रिया पेश करने व सामूहिक रूप से प्रेषित करने का बल बूता होता है, चाहे वो नजरिया कितना भी संकीर्ण क्यों न हो!

कब जागोगे पथिक?

प्रकृति बार बार आगाह करती है। हम बार बार उसे समझने की कोशिश सा करते हैं। बार बार सवाल उठाते हैं और जवाब ढूँढते हैं। फिर बार बार कुछ ठोस कदम उठाने की प्रतिज्ञा लेते हैं। पर अंततः भूल जाते हैं!

फेसबुक की दीवार

हम अक्सर फेसबुक को कोसते हैं पर वो तो महज एक औज़ार है। औज़ार की उपयोगिता, अनुउपयोगिता या दुरउपयोगिता तो उसे इस्तेमाल करने वाले निर्धारित करते हैं। किसी औज़ार को कोस कर क्या फायदा?

सोचो समझो जोर लगाओ

पहेली को एक छोटी सी कविता के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो उसे समझने बूझने की प्रक्रिया और भी मजेदार हो जाती है। प्रस्तुत पहेलियाँ इसी प्रयोग का एक हिस्सा है। इस तरीके का प्रयोग कर बच्चों को कविता लेखन की लिए भी प्रेरित किया जा सकता है।

पहाड़ और तुम्हारी सहानुभूति

पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर चर्चा करना आसान है पर उनके संरक्षण की ओर कदम बढ़ाना काफी कठिन है। मुद्दा तब और भी गंभीर हो जाता है जब बात पहाड़ों की हो क्योंकि पहाड़ जितने सुंदर और बुलंद हैं, उतने ही नाजुक भी है।

हार जाना तुम मेरी आँखों के तारे

बच्चों की होमस्कूलिंग हमारे लिए एक अभूतपूर्व निर्णय था। बच्चे भी हमारे इस निर्णय का औचित्य समझ नहीं पा रहे थे। ऐसे में मैंने होमस्कूलिंग पर एक कविता लिखी जो हमें याद दिलाती रहे कि जो हम कर रहे है वो क्यों कर रहे हैं।

उत्तर फिज़ाओं में है!

जाने माने गायक बॉब डिलन ने 1962 में ‘ब्लोइंन इन द विन्ड’ लिखा और 1963 में गीत रिलीज हुआ। आज, पाँच दशक बाद भी यह गाना लोगों की जुबां पर है। चाह है की इसे हिन्दी में भी गाया और सुना जाए। इसी लिए यह हिन्दी अनुवाद।

सुदूर हिमालय का यह उत्पात

किन्नौर की वह खूबसूरत घाटी कभी कभार धमाकों की आवाज़ से गूँज उठती थी। कुछ रोज ये धमाके देर रात भी सुनाई दिए। कारण बेहद व्यथित करने वाला था। पर क्या किया जा सकता है? मानव कल्याण की कीमत तो चुकानी ही होगी!

आज तो प्रिये कोई बहाना ना बनाओ!

सावन की वर्षा और यथार्थ की बारिश कितनी अलग हैं। कविताओं, कहानियों व गीतों का सावन सपने जगाता है। यथार्थ का सावन मुँह चिढ़ाता है। उसी चिढ़ावन पर कुछ पंक्तियाँ।

वर्तमान ये भूल ना जाना

लोकतंत्र लोक से चलता है। पर लोक कैसे चलता है? प्रचार से? अधिप्रचार से? या समझ बूझ से – यथार्थ की निष्पक्ष समीक्षा करते हुए उज्वल और ईमानदार भविष्य के व्यावहारिक सपने बुनता हुआ!