कविताएँ, क्षणिकाएँ व गीत

इस क्षेणी में छोटी बड़ी कविताएँ, गीत, क्षणिकाएँ… सभी हैं। अधिकांश कविताएँ स्वरचित है – जीवन के अलग अलग दौर में। पर कुछ कविताएँ/गीत अनुवादित हैं और कुछ पैरोडी। ऐसी गीत/कविताओं में मूल कविता/गीत का जिक्र या लिंक दिया गया है।

आईआईटी, आईआईएम और जेएनयू

भीड़ में इन्सान को पहचाना कठिन होता है। इंसानों को उनके कर्मों से पहचाने के लिए काफी वक्त चाहिए जो अमूमन लोगों के पास नहीं होता। इसलिए जमाना तमगों का है। हम क्या हैं वह ‘हम’ नहीं बल्कि हमारे ठप्पे तय करते हैं।

किसका पहाड़

पहाड़ भी महज एक कोना ही तो है इस संसार का। उसे भी दुनिया वैसी ही दिखाई देती है जैसी बाकि सब को। इसीलिए पहाड़ भी वक्त जाया करता है इस संवाद में कि यह जमीन किसकी है, यह संस्कृति किसकी है…

टाई वाला

अमूमन हर झाम का केंद्र टाई वाले होते हैं। वे दिखते नहीं हैं, पर होते हैं! उन सभी झामों में भी जिन्हें देख कर लगता नहीं की टाई वाले ऐसा कर सकते हैं। समय मिले तो सोचिएगा – क्या बिना टाई पहने संभव है इतना कुछ?

नीले दाँत वाला आदमी

सबसे पहले पहल जब एक नीले दाँत वाले तो देखा तो घबरा गया। सोचने लगा की ये क्या नई बला आ गई इंसानियत तो परेशान करने। मैं आधुनिक सामाजिक तानेबाने के कारण पैदा हुई मानसिक स्थितियों को कोसने लगा था।

चिरस्थायी समृद्धि का मूल मंत्र

समृद्धि एक ऐसा हाथी है जिसे सब अपने नजरिए से देखते हैं। पर अंततः नजरिया उसका जीतता है जिसके पास अपना नज़रिया पेश करने व सामूहिक रूप से प्रेषित करने का बल बूता होता है, चाहे वो नजरिया कितना भी संकीर्ण क्यों न हो!

कब जागोगे पथिक?

प्रकृति बार बार आगाह करती है। हम बार बार उसे समझने की कोशिश सा करते हैं। बार बार सवाल उठाते हैं और जवाब ढूँढते हैं। फिर बार बार कुछ ठोस कदम उठाने की प्रतिज्ञा लेते हैं। पर अंततः भूल जाते हैं!

फेसबुक की दीवार

हम अक्सर फेसबुक को कोसते हैं पर वो तो महज एक औज़ार है। औज़ार की उपयोगिता, अनुउपयोगिता या दुरउपयोगिता तो उसे इस्तेमाल करने वाले निर्धारित करते हैं। किसी औज़ार को कोस कर क्या फायदा?

सोचो समझो जोर लगाओ

पहेली को एक छोटी सी कविता के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो उसे समझने बूझने की प्रक्रिया और भी मजेदार हो जाती है। प्रस्तुत पहेलियाँ इसी प्रयोग का एक हिस्सा है। इस तरीके का प्रयोग कर बच्चों को कविता लेखन की लिए भी प्रेरित किया जा सकता है।

पहाड़ और तुम्हारी सहानुभूति

पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर चर्चा करना आसान है पर उनके संरक्षण की ओर कदम बढ़ाना काफी कठिन है। मुद्दा तब और भी गंभीर हो जाता है जब बात पहाड़ों की हो क्योंकि पहाड़ जितने सुंदर और बुलंद हैं, उतने ही नाजुक भी है।

हार जाना तुम मेरी आँखों के तारे

बच्चों की होमस्कूलिंग हमारे लिए एक अभूतपूर्व निर्णय था। बच्चे भी हमारे इस निर्णय का औचित्य समझ नहीं पा रहे थे। ऐसे में मैंने होमस्कूलिंग पर एक कविता लिखी जो हमें याद दिलाती रहे कि जो हम कर रहे है वो क्यों कर रहे हैं।