नवीन पाँगती

आईआईटी, आईआईएम और जेएनयू

भीड़ में इन्सान को पहचाना कठिन होता है। इंसानों को उनके कर्मों से पहचाने के लिए काफी वक्त चाहिए जो अमूमन लोगों के पास नहीं होता। इसलिए जमाना तमगों का है। हम क्या हैं वह ‘हम’ नहीं बल्कि हमारे ठप्पे तय करते हैं।

किसका पहाड़

पहाड़ भी महज एक कोना ही तो है इस संसार का। उसे भी दुनिया वैसी ही दिखाई देती है जैसी बाकि सब को। इसीलिए पहाड़ भी वक्त जाया करता है इस संवाद में कि यह जमीन किसकी है, यह संस्कृति किसकी है…

टाई वाला

अमूमन हर झाम का केंद्र टाई वाले होते हैं। वे दिखते नहीं हैं, पर होते हैं! उन सभी झामों में भी जिन्हें देख कर लगता नहीं की टाई वाले ऐसा कर सकते हैं। समय मिले तो सोचिएगा – क्या बिना टाई पहने संभव है इतना कुछ?

फैमिली ट्री

स्कूल बस में हर रोज किसी न किसी अभिभावक की बस ड्यूटी लगती है। दिन की ड्यूटी अमूमन शिक्षक निभाते हैं क्योंकि अधिकाँश माँ बाप नौकरी पेशा हैं। हर महीने के पहले सोमवार को सुधीर की बारी आती है।

नीले दाँत वाला आदमी

सबसे पहले पहल जब एक नीले दाँत वाले तो देखा तो घबरा गया। सोचने लगा की ये क्या नई बला आ गई इंसानियत तो परेशान करने। मैं आधुनिक सामाजिक तानेबाने के कारण पैदा हुई मानसिक स्थितियों को कोसने लगा था।

सौंदर्यबोध

सुंदर पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए अक्सर तन थक जाता है पर मन नहीं। इसलिए जैसे ही मुझे सुन्दर बुरांश के फूल दिखे मैं अपनी सारी थकान भूल सा गया और अपने बालकपन में लगभग फुदकते हुए जोर से बोल बैठा, “अहा, कितना सुन्दर फूल है! “

नामकरण

दो छोटे खेतों, एक भैंस, दो गाय और छह बकरियों के कारण गाँव शहर न जा सका। और गाँव तथा पास के पहाड़ी शहर में नदारत स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते शहर गाँव नहीं आ पाया। इसलिए तय हुआ की शिवराज, अपनी पत्नी सावित्री, और 20 दिन के बच्चे के साथ गाँव आएगा ताकि 21वें दिन नामकरण हो सके।

चिरस्थायी समृद्धि का मूल मंत्र

समृद्धि एक ऐसा हाथी है जिसे सब अपने नजरिए से देखते हैं। पर अंततः नजरिया उसका जीतता है जिसके पास अपना नज़रिया पेश करने व सामूहिक रूप से प्रेषित करने का बल बूता होता है, चाहे वो नजरिया कितना भी संकीर्ण क्यों न हो!

फौजी भूत का जंगल

राजू गुरु की चाय की दुकान में चली चर्चा एक जंगल की जिसे सुना एक भूत ने बनाया है। एक ऐसे दौर में करोड़ों पेड़ों का जंगल उग आया जब उत्तराखंड में जंगल खत्म होने की कगार पर हैं। क्या सच में मसला भूत का है या कहानी कुछ और ही है?

लोकतंत्र का ठेका

आज से जात बिरादरी उतना मायने नहीं रखेगी क्योंकि ग्राम और जिला पंचायत के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। पर यह बात शराबी नहीं जानते इसलिए अभी भी अँधेरे को, पेड़ों को और हवा को गालियाँ देते हुए घूम रहे हैं। इनमें से कई, कई दिनों से नशे में है। एक निजी निर्णय का इतना लाभ कभी कभार ही मिलता है।