अछूत पंडित

दिन भर, बेखौफ, यहाँ वहाँ की खाक छान कर पंडितजी शाम को जबरदस्त पूजा अर्चना करते थे। बावजूद उसके पण्डितजी को कोविड हो गया। बात बिगड़ी, पर उतनी नहीं की अस्पताल जाना पड़े। हाँ, उनके चक्कर में गाँव के सात लोग जरूर कोरोना संक्रमित हो गए जिनमें से चार को अस्पताल जाना पड़ा और दो मरते मरते बचे।

पन्द्रह बीस दिन बाद ठीक ठाक हो कर पण्डितजी सीना चौड़ा कर गाँव के मैदान पर ऐसे पहुँचे मानो कोई जंग जीत कर आयें हों। इस पहाड़ी गाँव का यह मैदान सदियों से चौक की भूमिका निभा रहा था। यहाँ लड़के क्रिकेट खेलते थे तो बुजुर्ग ताश। लड़के बंटा पीते थे तो बुजुर्ग बीड़ी, शराब, और चरस। मैदान के आस पास चाय नाश्ते की चार दुकानें थी। इन दुकानों की भी अपनी अपनी जातियाँ थी। सब का कारोबार अच्छा चल रहा था क्योंकि शाम को गाँव के समस्त जातियों के पुल्लिंग इसी मैदान के इर्द गिर्द पाए जाते थे।

अमूमन पण्डितजी जब भी आते तो लोग खड़े हो कर सलाम ठोकते थे। पूजा अर्चना में बहुत ताकत जो होती है। पर आज का नजारा देख कर पण्डितजी हतप्रभ रह गए। पास आने की जगह लोग उनसे दूरी बनाने की कोशिश कर रहे थे। वो जैसे ही किसी समूह की ओर बढ़ते, लोग कोई बहाना मार थोड़ा आगे खिसक जाते। आखिरकार पण्डितजी से न रहा गया, बोले, “अबे अछूत थोड़े ही हूँ! कोरोना हुआ था। अब सब ठीक हो गया है।“

कोई कुछ नहीं बोला। कुछ लोग हँसी दबाने की भरसक कोशिश कर रहे थे। मैदान के उत्तरी छोर पर स्थित काफल के पेड़ पर पाँव टिका कर खड़ा एक दलित लड़का वहीं से चिल्लाया, “आऊँ पण्डितजी, गले मिलने?” यह सुन कुछ लोग हँसना चाहते थे पर हँस न सके। कौन बिन बात पाप का भागीदार बनना चाहता है भला।

ना जाने क्यों आज गुस्सैल पण्डितजी ने भी कोई गाली नहीं दी। वो चुपचाप मुड़े और घर की ओर चल दिए, ना जाने क्या बड़बड़ाते हुए।

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