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सत्येन्द्र – वृतान्त 9

सारी बातें बताई मेनका ने अलंकार को – अपने छात्र जीवन का अनुभव, सत्येन्द्र के साथ बंगाल भ्रमण, कल्कत्ते की वह शाम, उसके बाद के अंतरंग अनुभव और वह भयावह हादसा। फिर मेनका का बंगलौर चले आना और सत्येन्द्र का ईमेल।

सत्येन्द्र – वृतान्त 8

मेनका के अचानक यूँ आने और उसके हाव भाव देख कर माँ बहुत चिन्तित हो गई। यद्यपि मेनका सामान्य रूप से दिन बिताने की पूरी कोशिश कर रही थी पर उसकी माँ को साफ दिख रहा था कि कुछ भी सामान्य नहीं है।

सत्येन्द्र – वृतान्त 7

जो हम चाहते हैं उसकी आस लगाते है।पर कुछ चीजें ऐसी भी होती हैं जिनके मिलने के बारे में हम सोचते ही नहीं, या फिर सोचना बंद कर देते हैं। इसका अर्थ यह नहीं होता की हमने उसे चाहना बंद कर दिया है। हम बस मन को मना लेते हैं की सोचना मना है।

सत्येन्द्र – वृतान्त 6

साथ चलते चलते वे अच्छे दोस्त बन गए। अलंकार वकील जरूर था पर बात बनाने में अभी माहिर नहीं हुआ था। वह कुछ कहना चाहता था पर समझ नहीं पा रहा था की कैसे कहे इसलिए एक दिन बिन मौके ‘आई लव यू’ कह बैठा।

सत्येन्द्र – वृतान्त 5

जानती हूँ की हर मर्द एक सा नहीं होता पर अगर फिर से कोई वैसा ही कोई मिल गया तो पूरी तरह से टूट जाऊँगी। अभी कम से कम जी तो पा रही हूँ। वैसे हर औरत के जीवन में एक आदमी का होना जरुरी भी तो नहीं है।

सत्येन्द्र – वृतान्त 4

जान लिया मेरा सच? अब बताईए कि मैं कैसे करूँ किसी से इश्क? हर आदमी जो मुझे पसन्द आता है उसमें मुझे वही शिकारी दिखाई देता है। मैं मानने सा लगी हूँ कि हर प्रेमी आखिरकर दरिंदा हो ही जाएगा क्योंकि यह पुरुष का मूल स्वभाव है।

सत्येन्द्र – वृतान्त 3

खिड़की के पास पड़ी कुर्सी में बैठ स्नेहलता उन उड़ते परिंदों को ताकने लगी जो दिल्ली की मुक्त पर जहरीली हवा में उड़ान भर रहे थे। खिड़की के निचले छोर से एक कँटीली टहनी पर खिले दो फूल स्नेहलता को निहार रहे थे।

सत्येन्द्र – वृतान्त 2

पन्तजी को काटो तो खून नहीं। भगत सिंह की जयजयकार करने वाले भी अपने घरों में भगत सिंह नहीं चाहते। पन्तजी के लिए हाँ कहना मुश्किल था। कुमाउँ के उच्चतम कुल का लड़का अगर ऐसा करेगा तो कितनी बातें होंगी समाज में।

सत्येन्द्र – वृतान्त 1

फैसले में कही जा रही बातें स्नेहलता कई बार सुन चुकी थी। उसे तो बस इस कानूनी बहस के अन्त में दिए जाने वाले निर्णय का इन्तज़ार था। वह सत्येन्द्र को रिहा करा कर घर जाना चाहती थी। वह एक रात में महीनों की नींद सोना चाहती थी।

आईआईटी, आईआईएम और जेएनयू

भीड़ में इन्सान को पहचाना कठिन होता है। इंसानों को उनके कर्मों से पहचाने के लिए काफी वक्त चाहिए जो अमूमन लोगों के पास नहीं होता। इसलिए जमाना तमगों का है। हम क्या हैं वह ‘हम’ नहीं बल्कि हमारे ठप्पे तय करते हैं।