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सोचो समझो जोर लगाओ

पहेली को एक छोटी सी कविता के रूप में प्रस्तुत किया जाए तो उसे समझने बूझने की प्रक्रिया और भी मजेदार हो जाती है। प्रस्तुत पहेलियाँ इसी प्रयोग का एक हिस्सा है। इस तरीके का प्रयोग कर बच्चों को कविता लेखन की लिए भी प्रेरित किया जा सकता है।

फ्यूंली

कहते हैं की हर दस किलोमीटर में भाषा का स्वरुप बदल जाता है। मुहावरे और लोकोक्तियाँ बदलने लगती हैं। कुछ ऐसा ही लोक कथाओं के साथ भी होता है जो जगह और समय के अनुसार अपने को नए रंग में ढाल लेतीं हैं। ऐसी ही एक अद्भुत कथा है फ्यूंली की।

पहाड़ और तुम्हारी सहानुभूति

पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर चर्चा करना आसान है पर उनके संरक्षण की ओर कदम बढ़ाना काफी कठिन है। मुद्दा तब और भी गंभीर हो जाता है जब बात पहाड़ों की हो क्योंकि पहाड़ जितने सुंदर और बुलंद हैं, उतने ही नाजुक भी है।

हैरी का ईष्ट देवता

हैरी की एक छोटी सी दुकान है चौराहे पर। वो पैदा तो हरिया हुआ था पर जब परिवार ईसाई बना तो उसका नाम हरिया से हैरी हो गया। पिताजी हरदा हेनरीदा हो गए पर ईजा ईजा ही रही।

हार जाना तुम मेरी आँखों के तारे

बच्चों की होमस्कूलिंग हमारे लिए एक अभूतपूर्व निर्णय था। बच्चे भी हमारे इस निर्णय का औचित्य समझ नहीं पा रहे थे। ऐसे में मैंने होमस्कूलिंग पर एक कविता लिखी जो हमें याद दिलाती रहे कि जो हम कर रहे है वो क्यों कर रहे हैं।

उत्तर फिज़ाओं में है!

जाने माने गायक बॉब डिलन ने 1962 में ‘ब्लोइंन इन द विन्ड’ लिखा और 1963 में गीत रिलीज हुआ। आज, पाँच दशक बाद भी यह गाना लोगों की जुबां पर है। चाह है की इसे हिन्दी में भी गाया और सुना जाए। इसी लिए यह हिन्दी अनुवाद।

सुदूर हिमालय का यह उत्पात

किन्नौर की वह खूबसूरत घाटी कभी कभार धमाकों की आवाज़ से गूँज उठती थी। कुछ रोज ये धमाके देर रात भी सुनाई दिए। कारण बेहद व्यथित करने वाला था। पर क्या किया जा सकता है? मानव कल्याण की कीमत तो चुकानी ही होगी!

आज तो प्रिये कोई बहाना ना बनाओ!

सावन की वर्षा और यथार्थ की बारिश कितनी अलग हैं। कविताओं, कहानियों व गीतों का सावन सपने जगाता है। यथार्थ का सावन मुँह चिढ़ाता है। उसी चिढ़ावन पर कुछ पंक्तियाँ।

अछूत पंडित

दिन भर, बेखौफ, यहाँ वहाँ की खाक छान कर पंडितजी शाम को जबरदस्त पूजा अर्चना करते थे। बावजूद उसके पण्डितजी को कोविड हो गया। बात बिगड़ी, पर उतनी नहीं की अस्पताल जाना पड़े।

बोलना जरुरी है

बचपन से ही लोगों को कहते हुआ सुना है – मितभाषी बनो! कम बोलो, अच्छा बोलो! कई मायनों में यह बात सही है। पर कई मायनो में गलत भी। कम बोलना अच्छी बात है। पर केवल तब तक, जब तक मन मस्तिष्क सुन्न नहीं हैं।